"सेवा केवल हाथों से नहीं, मन और आत्मा से होनी चाहिए।"
पन्नालाल अग्रवाल का जीवन सेवा, संस्कार, सादगी और सामाजिक समर्पण का प्रेरणादायी उदाहरण है। उनका मानना है कि समाज सेवा कोई दिखावे या प्रसिद्धि का माध्यम नहीं, बल्कि मनुष्य के जीवन का वह संस्कार है जो परिवार और समाज से प्राप्त मूल्यों के साथ निरंतर मजबूत होता जाता है।
बचपन से ही परिवार में मिले सेवा और संस्कारों ने उनके व्यक्तित्व को ऐसी दिशा दी, जिसमें दूसरों की सहायता करना और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाना उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।
पन्नालाल अग्रवाल का जन्म 7 जून 1972 को हुआ। उनके पिता मोहनलाल अग्रवाल एवं माता विद्या देवी अग्रवाल ने उन्हें बचपन से ही अच्छे संस्कार और मानवीय मूल्यों की शिक्षा दी।
उनका पैतृक गांव नारनौल, हरियाणा है। उन्होंने हैदराबाद से एसएससी तक शिक्षा प्राप्त की। परिवार के संस्कारों और सकारात्मक वातावरण ने उनके जीवन में सेवा की भावना को निरंतर मजबूत किया।
15 मई 1995 को उनका विवाह पिंकी अग्रवाल के साथ हुआ। उनके दो पुत्र नमन अग्रवाल एवं वैभव अग्रवाल और एक पुत्री रुपल अग्रवाल हैं।
परिवार के संस्कारों और सकारात्मक वातावरण ने उनके जीवन में सेवा की भावना को निरंतर मजबूत किया। पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ वे सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय रूप से जुड़े रहे हैं।
पन्नालाल अग्रवाल का विश्वास है कि जीवन में व्यक्ति कितना आगे बढ़ा, यह केवल उसकी व्यक्तिगत उपलब्धियों से नहीं, बल्कि इस बात से भी तय होता है कि उसने समाज के लिए कितना योगदान दिया।
इसी सोच के साथ वे लंबे समय से विभिन्न सामाजिक एवं सेवा गतिविधियों से जुड़े हुए हैं। अग्रवाल समाज तेलंगाना से जुड़े रहने के साथ-साथ वे राधे-राधे ग्रुप हैदराबाद के सेवा कार्यों में भी अपनी सहभागिता निभा रहे हैं।
राधे-राधे ग्रुप हैदराबाद के माध्यम से होने वाली सेवा गतिविधियों में उनका जुड़ाव उनके सेवा भाव को और अधिक व्यापक बनाता है। वे मानते हैं कि जरूरतमंद तक भोजन पहुंचाना, किसी असहाय की सहायता करना और समाज में आपसी सहयोग की भावना को मजबूत करना ही वास्तविक सामाजिक सेवा है।
पन्नालाल अग्रवाल का सेवा क्षेत्र केवल मानव सेवा तक सीमित नहीं है। वे श्याम भरोसे सेवा समिति, हैदराबाद तथा आहार सेवा नित्य प्रसाद सेवा से जुड़े हुए हैं और हैदराबाद की विभिन्न गौशालाओं के सेवा कार्यों में भी अपनी भूमिका निभाते हैं।
गौ सेवा के प्रति उनकी श्रद्धा और संवेदनशीलता उनके संस्कारों का ही परिणाम है। उनका मानना है कि जीव मात्र के प्रति करुणा रखना भारतीय संस्कृति की मूल भावना है।
पन्नालाल अग्रवाल के व्यक्तित्व की सबसे खास बात यह है कि वे सेवा कार्यों के प्रचार-प्रसार से दूर रहते हैं। उनके लिए सेवा का वास्तविक आनंद उस समय मिलता है, जब किसी जरूरतमंद को सहायता मिलती है और उसके चेहरे पर संतोष दिखाई देता है।
वे मानते हैं कि सेवा का मूल्य इस बात में नहीं है कि कितने लोगों को बताया गया, बल्कि इस बात में है कि कितने लोगों के जीवन में उसका सकारात्मक प्रभाव पड़ा।
पन्नालाल अग्रवाल के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है कि “सेवा केवल हाथों से नहीं, मन और आत्मा से होनी चाहिए।” उनका मानना है कि जब सेवा के पीछे सच्ची संवेदना होती है, तब छोटी-सी सहायता भी किसी के लिए बहुत बड़ी बन जाती है।
सेवा में धन से अधिक भावना, समय से अधिक समर्पण और शब्दों से अधिक कर्म का महत्व होता है। उनका जीवन इसी विचार का उदाहरण है।
पन्नालाल अग्रवाल चाहते हैं कि आज की युवा पीढ़ी केवल अपने भविष्य के बारे में न सोचे, बल्कि समाज और जरूरतमंद लोगों के प्रति भी अपनी जिम्मेदारी को समझे।
उनका विश्वास है कि सेवा के लिए किसी बड़े पद, बड़ी संस्था या बड़े साधन की आवश्यकता नहीं होती। सच्चा सेवा भाव हो तो व्यक्ति अपने आसपास से ही सेवा की शुरुआत कर सकता है।
राधे-राधे ग्रुप हैदराबाद की सेवा यात्रा से जुड़े पन्नालाल अग्रवाल का व्यक्तित्व इस विचार को मजबूत करता है कि समाज में बदलाव बड़े-बड़े भाषणों से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे सेवा कार्यों की निरंतरता से आता है।
परिवार से मिले संस्कारों को जीवन में उतारते हुए वे मानव सेवा और गौ सेवा के माध्यम से समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।
सादगी उनका स्वभाव है, संस्कार उनकी ताकत हैं और सेवा उनके जीवन की पहचान है। पन्नालाल अग्रवाल का विश्वास है कि जब सेवा मन से निकलती है, तो वह केवल एक कार्य नहीं रहती—वह ईश्वर की आराधना और मानवता की सच्ची साधना बन जाती है।
“सेवा केवल हाथों से नहीं, मन और आत्मा से होनी चाहिए। सच्ची सेवा वही है, जो निस्वार्थ भाव से की जाए और मानवता के प्रति हमारी जिम्मेदारी को दर्शाए।”